आज गया सिर और गया कूप में पिंडदान का विधान है. यहां पिंडदान से पितरों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति की मान्यता। // LIVE NEWS 24
गया: बिहार के गया में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला चल रहा है, जो हिंदू धर्म में पितरों की शांति और मोक्ष के लिए विशेष महत्व रखता है. इस मेले के ग्यारहवें और गया श्राद्ध के दसवें दिन, आश्विन कृष्ण दशमी को गया सिर और गया कूप में पिंडदान करने का विधान है. मान्यता है कि इन पवित्र पिंड वेदियों पर पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है और वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त हो जाते हैं.
गयासुर से जुड़ी पौराणिक मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, गया सिर और गया कूप गयासुर राक्षस के सिर और नाभि पर स्थित हैं. धर्म पुराणों और शास्त्रों में इन पिंड वेदियों का विशेष उल्लेख है, जिसमें इनके महत्व और पिंडदान के फल को विस्तार से बताया गया है. गया सिर को गयासुर के सिर और गया कूप को उसकी नाभि का प्रतीक माना जाता है. इन स्थानों पर पिंडदान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है.नरक भोग रहे पितरों के लिए खुलता है मोक्ष का द्वार पिंडदान के नियम और विधि-विधान का पालन: आश्विन कृष्ण दशमी को गया सिर और गया कूप में पिंडदान करने का विशेष विधान है. तीर्थयात्रियों को पूरे नियम और विधि-विधान के साथ पिंडदान का कर्मकांड करना चाहिए. इन पवित्र वेदियों पर पिंडदान करने से पितरों को न केवल शांति मिलती है, बल्कि उन्हें स्वर्ग लोक की प्राप्ति भी होती है. यह कर्मकांड पितरों की आत्मा को मोक्ष प्रदान करने में सहायक माना जाता है.
गया कूप में पिंडदान का विधान
गया सिर है नरक भोग रहे पितरों के लिए मोक्ष का द्वार: गया सिर, जो विष्णुपद मंदिर से दक्षिण दिशा में स्थित है, विशेष रूप से उन पितरों के लिए महत्वपूर्ण है जो नरक में भोग रहे हैं. मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से ऐसे पितरों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है. इस स्थान पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिलती है, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है
गया कूप है प्रेत बाधा से मुक्ति का स्थान: गया सिर से पश्चिम दिशा में एक घेरे में स्थित गया कूप भी अत्यंत पवित्र स्थल है. यहां पिंडदानी आह्वाहित नारियल अर्पित करते हैं. मान्यता है कि गया कूप में पिंडदान और नारियल अर्पण करने से प्रेत बाधा में फंसे पितरों को मुक्ति मिलती है और उन्हें स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है. यह स्थान विशेष रूप से अकाल मृत्यु वालों के लिए पिंडदान के लिए महत्वपूर्ण है.
22 लाख से अधिक पिंडदानी पहुंचे गया
पिंडदान के बाद पूजा का महत्व: गया सिर और गया कूप के समीप ही मां संकटा देवी का अति प्राचीन मंदिर स्थित है. पिंडदान के पश्चात तीर्थयात्रियों को इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि मां संकटा देवी की पूजा से परिवार में होने वाले क्लेश और बाधाएं दूर होती हैं, जिससे जीवन में सुख-शांति का संचार होता है.
22 लाख से अधिक पिंडदानी पहुंचे गया: पितृपक्ष मेले में अब तक 22 लाख से अधिक पिंडदानी गया पहुंच चुके हैं. देश और विदेश से तीर्थयात्री लगातार इस पवित्र नगरी में आ रहे हैं. मेले के अंतिम दिनों में भीड़ और अधिक बढ़ने की संभावना है. गया का यह मेला न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, जो विश्व भर में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है
पितृपक्ष मेला है मोक्ष और शांति का मार्ग: गयापाल पंडा गजाधर लाल कटरियार ने बताया कि गया में पितृपक्ष मेला और गया सिर व गया कूप में पिंडदान की परंपरा पितरों को मोक्ष और शांति प्रदान करने का एक अनूठा माध्यम है. इन पवित्र स्थानों पर पिंडदान करने से न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का वातावरण बनता है. यह मेला हिंदू धर्म की आध्यात्मिक परंपराओं का एक जीवंत उदाहरण है.
गया श्राद्ध के 10 वें दिन गया कूप और गया सिर में पिंडदान का विधान है. गया सिर और गया कूप में पिंडदान से किसी भी प्रकार की बाधा में रहे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और उन्हें स्वर्ग लोक मिल जाता है. इन दोनों पिंड वेदियों पर पिंडदान करने का काफी महत्व है."